सरकार रामालय न्यास को दे श्रीराम मंदिर बनाने की अनुमति: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज

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वाराणसी. अयोध्या में राम जन्मभूमि प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सबसे पहले रामालय न्यास ने राम मंदिर बनाने का दावा पेश किया है। न्यास का दावा है कि 1994 में अयोध्या की श्रीरामजन्मभूमि में भव्य-दिव्य और शास्त्रोक्त श्रीराममन्दिर बनवाने के उद्देश्य से देश के मूर्धन्य धर्माचार्यों की सदस्यता में अयोध्या श्रीरामजन्मभूमि रामालय न्यास का गठन किया गया था। न्यास आज भी जीवित है और मन्दिर निर्माण के लिये प्रतिबद्ध है। श्रीराममन्दिर निर्माण के लिए भूमि और योजना को ट्रस्ट को दिए जाने के संबंध में न्यास सरकार से आग्रह करेगा।

1. माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपने फैसले के पैराग्राफ 802 में कहा है कि एक्वीजीशन ऑफ सर्टेन एरिया एट अयोध्या एक्ट 1993 की धारा 6 केन्द्रीय सरकार को अधिगृहीत भूमि को किसी ऐसे अथोरिटी बाडी निकाय या ट्रस्ट को देने के लिए प्राधिकृत करती है जो कि सरकार द्वारा आरोपित शर्तों को मानने का इच्छुक हो । 2. फैसले के पैराग्राफ 803 में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को यह आदेश दिया है कि उक्त अधिनियम की धाराओं 6 व 7 के द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए सरकार कोई ट्रस्ट स्थापित करे अथवा कोई अन्य समुचित कार्यनिधि स्थापित करे जिसको कि वाद संख्या 5 में डिक्रीड न्यायादेशित भूमि दी जा सके । 3. माननीय न्यायालय के उपर्युक्त दो पैराग्राफों से स्पष्ट है कि न्यायादेशित भूमि न तो श्रीरामजन्मभूमि वाद सं 5 के वादी सं 3 देवमित्र को दी गयी है और न ही श्रीरामजन्मभूमि न्यास को दी गयी है । बाकी सम्पूर्ण भूमि भगवान् श्रीराम के हित में मन्दिर निर्माण हेतु उक्त 1993 के अधिनियम की धारा 6 और 7 के अनुसार स्थापित किये जाने वाले ट्रस्ट को देने का आदेश दिया गया है । 4. उक्त अधिनियम की धारा 6 में यह कहा गया है कि उस 1993 के अधिनियम के पारित किये जाने के बाद बनाये गये ऐसे किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय या किसी ट्रस्ट के ट्रस्टियों को अधिगृहीत भूमि दी जाएगी जो सरकार के नियमों और शर्तों का पालन करने के इच्छुक हों। धारा 7 के अनुसार अधिगृहीत भूमि सम्पत्ति का प्रबन्धन वही प्राधिकारी, निकाय अथवा ट्रस्ट करेगी जिसे भूमि दी जाएगी । 5. निर्णय के पैराग्राफ 805 – 2 में वाद सं 5 की प्रार्थना अ और ब के अनुसार न्यायादेश पारित किया है । वाद की प्राथना अ में यह उद्घोषणा मांगी गयी है कि संलग्न 1, 2 और 3 में सीमांकित भूमि देवताओं की है । वाद की प्रार्थना ब में प्रतिवादियों को निरन्तर निषेधाज्ञा द्वारा रामजन्मभूमि पर मन्दिर बनाने में बाधा देने से रोक देने का अनुतोश माॅंगा गया है । ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि भूमि किसी रामजन्मभूमि न्यास को देने का न तो अनुतोश मांगा गया था और न ही दिया गया है । 6. निर्णय के पैराग्राफ 805 – 2 – 1 में तीन महीने के भीतर अधिनियम की धारा 6 व 7 के प्रावधानों के अनुरूप ट्रस्ट, प्राधिकरण या निकाय हेतु योजना बनाकर उसे भूमि हस्तान्तरित करने को कहा गया है । उक्त पैराग्राफ 805 की कण्डिका 2 में ऐसे किसी ट्रस्ट, प्राधिकरण या निकाय को भूमि को देने को कहा है जो धारा 6 व 7 के अनुरूप बनाया गया हो । वहीं कण्डिका 3 में कहा गया है कि विवादास्पद भूमि का कब्जा केन्द्र सरकार के रिसीवर के अधीन तब तक बना रहेगा जब तक कि 1993 की अधिनियम की धारा 6 के प्रावधानों के अनुरूप यह किसी ट्रस्ट या अन्य निकाय को नहीं दी जाती ।

 

न्यास आज भी जीवित है और मन्दिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है. ट्रस्ट की पहली बैठक वाराणसी के पंचगंगा घाट पर हुई थी, जहां चारों शंकराचार्य ने अपनी सहमति दी थी. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिये भूमि और योजना को ट्रस्ट को दिए जाने के सम्बन्ध में हम सरकार से आग्रह करने जा रहे हैं. हम जल्द ही केंद्र सरकार के सामने अपनी बात को रखेंगे, क्योंकि सरकार को भी भव्य राम मंदिर निर्माण की उत्सुकता है, ऐसे में हम ट्रस्ट द्वारा राम मंदिर का निर्माण चाहते हैं, जिसके लिए हम सरकार से मांग करेंगे.

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